भारतीय संस्कृति में संत महात्माओं महापुरुषों मनीषियों एवं साधकों का विषेश महत्व रहा है ...
भारतीय संस्कृति में संत महात्माओं महापुरुषों मनीषियों एवं साधकों का विषेश महत्व रहा है , ऐसे
ही
संत मनीषी
परम्पराओं के एक महान साधक, परम पूज्य परम श्रद्धेय संत श्री श्री 1008
तपस्वी श्री नारायण दास जी महाराज जो
परम तपस्वी,अध्यात्म ज्ञान से ओतप्रोत, नामनिष्ठ , करुणा एवं दया के प्रतिमूर्ति और जिनका जीवन
वैराग्य से
परिपूर्ण रहा।
महाराज श्री ने सीतामढ़ी (बिहार) जनपद अन्तर्गत रणजीतपुर पंचायत के एक छोटे से ग्राम बगही में
फाल्गुन शुक्ल
पक्ष द्वितीय 17 फरवरी 1917 में एक सुसंस्कृत और कर्तव्यनिष्ट तथा भक्ति से परिपूर्ण परिवार में
जन्म लिया।
युवावस्था को प्राप्त होते-होते मानों किसी दैवीय शक्ति ने विषेश रूप से महाराज श्री को प्रेरित
किया हो और
जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिय परम पिता परमात्मा ने उन्हें यहाँ भेजा वे सहज रूप से उस प्रेरणा
को
स्वीकार
कर अपने नये जीवन को आरम्भ किया जो पूर्ण रूप से भगवद् शक्ति , भगवद् प्रेम और भगवन्नाम
संकीर्तन का
जप एवं
प्रचार-प्रसार से परिपूर्ण रहा। शास्त्रो में वर्णित-कलयुग में नाम जप यज्ञ का विषेश रूप से
समय-समय
पर
आयोजन, भटके हुए जीवात्मा के लिए मानो देवदूत के रूप में साकार स्वरूप धारण करने वाले इस
महानपुरुष
ने भारत
के कोने-कोने में यात्रा करके श्री सीताराम नाम जप का अलख जगाया। यदि दूसरे रूप में देखा जाये
तो
गोस्वामी
महाराज श्री तुलसी दास जी ने भगवान शंकर के लिए कहा –
तुम पुनि राम राम दिन राती
सादर जपहु अनंग अराती।।
अथवा श्री हनुमान जी महाराज के लिए कहा –
सुमिरि पवनसुत पावन नामू
अपने वष करि राखे रामू।।
ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे ही किसी विशेष देवदूत के रूप में श्री महाराज जी को मानो परमात्मा ने
इस
धरा धाम
पे भेजा हो और उसी भाव एवं ईश्वर प्रेरणा के माध्यम से कभी नौ कीर्तन कुंज तो, कभी 27 कीर्तन
कुंज,
कभी 54
कीर्तन कुंज, तो कभी 81 कीर्तन कुंज, कभी 108 कीर्तन कुंज तो कभी 1008 कीर्तन कुंजों में
लाखों-लाख
साधकों
के द्वारा श्री सीताराम नाम जप महायज्ञ सम्पन्न कराया, तो फिर कभी सामूहिक रूप से (लाखों भक्तों
द्वारा)
श्री सीताराम नाम जप के उद्घोष को अक्षर ब्रह्म के माध्यम से अनंत आकाश के भक्तिमय मार्ग से
भारत के
साथ-साथ
सम्पूर्ण विष्व को यह संदेष देने का कार्य किया। कलयुग में ईश्वर प्राप्ति, ईश्वर अनुभूति,
ईश्वर
प्रेम अथवा
ईश्वर साक्षात्कार का सबसे सरलतम साधन यदि कोई है तो वह है निष्ठा पूर्वक भगवान के नाम का जप
करना।
लाखों-लाख की संख्या में या यूँ कहें जब ये महापुरुष उन लाखों भक्तों के लालायित नेत्रों को
अपनी
कृपा
दृष्टि प्रदान करने हेतु जब सन्मुख हुआ करते थे तो ऐसा प्रतीत होता था कि उन भक्तों के नेत्र
कुछ
समय के लिए
पलक झपकना बंद कर दिया हो और अपलक नेत्रों से इन महापुरुष का दर्शन प्राप्त कर मानों अपने
श्रद्धा
के अनुसार
श्री राम श्री कृष्णा अथवा भारतीय संत परम्परा के उन महान तत्त्व वेत्ताओं का दर्शन सहज ही इनके
रूप
में
प्राप्त हो रहा हो।
प्रिय भक्तों ! हम एक ऐसे भारतीय महान संत का परिचय आप से करा
रहें है जिन्होंने भेद-भाव, छुवा-छूत ,
जात-पात, धर्म-वाद, सम्प्रदायवाद को समाप्त करके अपने-अपने निष्ठा के अनुसार अपने-अपने लक्ष्य
की
प्राप्ति
का आग्रह करते थे। अपने जीवनकाल में राष्ट्र के विभिन्न प्रान्तों में राम नाम जपके कार्यक्रमों
के
माध्यम
से भगवान के नाम का प्रचार-प्रसार करते रहे तथा जो भी जीव उनके सान्निध्य में आया वह कृत्यकृत्य
हुआ।
राष्ट्र घर-घर में सीताराम नाम जपके प्रचार-प्रसार हेतु वृन्दावन, अयोध्या तथा सीतामढ़ी (बिहार)
में
राम-नाम
जप केन्द्र के रूप में तीन आश्रमों की स्थापना कर अनवरत राम नाम रूपी मणी की ज्योति जलायी जो आज
भी
तीनों
आश्रमों में अखण्ड राम नाम जप के रूप में जल रही है तथा इस कलयुग रूपी अन्धकार में भी जन-जन के
परम
कल्याण
का मार्ग प्रकाशित कर परिवार में आपसी प्रेम तथा सद्भाव से जीवन जीने की प्रेरणा दे रही है।
परम श्रद्धेय स्वामी रामाज्ञा दास जी महाराजकिशोरावस्था से ही आध्यात्मिक चिन्तन करते हुए संत महात्माओं के दर्शन की जिज्ञासा लिये अपने परिवार को छोड़कर अयोध्या के आश्रम तक पहुंचे । संत की खोज में भ्रमण करते हुए परम पूज्य श्री तपस्वी जी महाराज के आश्रम फटिक शिला पर आये और श्री महाराज जी का दर्शन प्राप्त किया। उनकी सेवा में लगे रहकर आध्यात्मिक जीवन जीने की शैली प्राप्त कर महाराज जी के सन्देश एवं उपदेश का प्रचार-प्रसार करना ही अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया। सन्देश के माध्यम से भारत के कोने-कोने में जाकर धर्मोपदेश करना तथा तीनों आश्रमों का विकास कार्य करते हुए भारतीय संस्कृति के संवर्द्धन में लगे रहना महाराज श्री की जीवन शैली है।
परम श्रद्धेय स्वामी श्री शुकदेव दास जी महाराज को बाल्यावस्था के सात वर्ष की अवस्था से वीतरागी, संतशिरोमणी , नामनिष्ठ , जीवनमुक्त दिव्यसंत श्री 1008 श्री तपस्वी नारायण दास जी महाराज (बगही सरकार जी) के सान्निध्य का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरूदेव के शरण में रहते हुये उनके निर्देशन में विद्यालयीय शिक्षा के साथ-साथ श्री मद्भगवद्गीता, श्री मद्भागवत महापुराण, श्री मद्वाल्मिकीय रामायण, श्री रामचरितमानस एवं उपनिषदों का गम्भीर अध्ययन किया। श्री महाराज जी अपने सुमधुर रसमय संगीत के माध्यम से सम्पूर्ण राष्ट्र के विभिन्न स्थलों पर श्री मद्भागवत कथा तथा श्री राम कथा का रस पान करा रहें हैं तथा श्री गुरूदेव भगवान जी के पावन सन्देश का प्रचार-प्रसार करते हुए आपसी प्रेम तथा करूणा के साथ जीवन जीने का उपदेश भी कर रहें हैं।